Mera kya Qasoor - Ek Dard Bhari Ghazal
نظروں کو تُو ہی بھایا، تو پھر میرا کیا قصور
دل نے تجھے پکارا، تو پھر میرا کیا قصور
ہر پل خیال تیرا رہا دل کے آس پاس
یادوں نے گھیر ڈالا، تو پھر میرا کیا قصور
یہ عشق وہ سمندر ہے جس میں نہیں کنارہ
ساگر نے جب ڈبویا، تو پھر میرا کیا قصور
محبوب بن کے آیا، تو پھر میرا کیا قصور
मेरा क्या कसूर – एक दर्द भरी ग़ज़ल
"मेरा क्या कसूर" एक बेहद भावुक और दिल को छू लेने वाली प्रेम ग़ज़ल है। इसमें एक ऐसे आशिक़ के जज़्बात बयान किए गए हैं, जो अपने दिल की सच्ची मोहब्बत को मासूम अंदाज़ में पेश करता है।
इस ग़ज़ल में शायर बार-बार एक ही सवाल करता है—"अगर मेरा दिल तुम्हें चाहने लगा, तो इसमें मेरा क्या कसूर?" वह कहता है कि किसी की खूबसूरती, अच्छी बातें और अपनापन देखकर दिल में मोहब्बत पैदा हो जाना इंसान के बस की बात नहीं होती।
ग़ज़ल का हर शेर सच्चे प्यार, बेबसी और दिल की गहराई को बयां करता है। इसमें आशिक़ की तड़प, महबूब की खूबसूरती और मोहब्बत की सच्चाई बहुत ही सरल और असरदार अंदाज़ में दिखाई देती है।
यह ग़ज़ल उन लोगों के दिल को ज़रूर छूएगी जिन्होंने कभी सच्चा प्यार किया हो या अपने जज़्बात को बिना किसी शिकायत के सिर्फ़ दिल में महसूस किया हो।
मेरा क्या कसूर – एक दर्द भरी ग़ज़ल | दिल की सच्ची मोहब्बत की कहानी
नज़रों को तू ही भाया, तो फिर मेरा क्या कसूर
दिल में तुझे बसाया, तो फिर मेरा क्या कसूर।
हर वक़्त मैं ही रहता हूँ तेरे ख़याल में,
दिल में मुझे बसाया, तो फिर मेरा क्या कसूर।
ये इश्क़ जिसको कहते हैं, दरिया है आग का,
जब हुस्न ने डुबोया, तो फिर मेरा क्या कसूर।
नज़रों को तू ही भाया, तो फिर मेरा क्या कसूर,
दिल ने तुझे पुकारा, तो फिर मेरा क्या कसूर।
हर पल ख़याल तेरा रहा दिल के आस-पास,
यादों ने घेर डाला, तो फिर मेरा क्या कसूर।
ये इश्क़ वो समंदर है जिसमें नहीं किनारा,
सागर ने जब डुबोया, तो फिर मेरा क्या कसूर।
"मोहिब" के दिल को तूने जो अपना बना लिया,
क़िस्मत ने साथ दिया, तो फिर मेरा क्या कसूर।

